'बाहुबली 2' के नए पोस्टर में वार करता दिख रहा है कटप्पा Aajtak 12 Mar. 2017 00:05 साल 2015 की सुपरहिट फिल्म रही 'बाहुबली' के सीक्वल 'बाहुबली 2' का लोग बड़ी ही बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं. आज फिल्म के निर्देशक एसएस राजामौली ने अपनी अपने आने वाली फिल्म 'बाहुबली 2' का नया पोस्टर जारी किया है. इस पोस्टर के दो हिस्से हैं, ऊपरी हिस्से में कट्प्पा अमरेंद्र बाहुबली को अपने हाथों से उठाए दिख रहा है, वहीं नीचे के हिस्से में कट्टप्पा बाहुबली को तलवार से मारता दिख रहा है. पोस्टर शेयर करते हुए राजामौली ने लिखा , 'जिस बच्चे को उसने बड़ा किया, जिस आदमी को उसने मार दिया.'
शनिवार, 11 मार्च 2017
राहुल द्रविड़ होगें टीम इंडिया के कोच,कुंबले को मिल सकती है बडी जिम्मेदारी
राहुल द्रविड़ होगें टीम इंडिया के कोच, कुंबले को मिल सकती है ये बड़ी जिम्मेदारी!
News State 11 Mar. 2017 22:59
नई दिल्ली:
टीम इंडिया के कोच अनिल कुंबले का कार्यकाल समाप्ति की ओर है। ऐसे में बीसीसीआई अनिल कुंबले को नई जिम्मेदारी सौंप सकता है। वहीं मीडिया रिपोर्ट्स की माने तो कुंबले की जगह भारतीय टीम के कोच पद का कार्यभार अंडर 19 और भारत ए टीम के कोच राहुल द्रविड़ को मिल सकता है।
टीम इंडिया के कोच अनिल कुंबले को जल्द ही बीसीसीआई में एक नया और महत्वपूर्ण पद मिल सकता है। बीसीसीआई के 'प्रशासको की समिति' में एक बड़ी जिम्मेदारी सौंपना चाहती है। 'समिति' का कहना है कि वह जल्द ही बीसीसीआई के स्टाफ में बदलाव करना चाहती है,कुंबले को जल्द ही टीम डायरेक्टर का पद दिया जा सकता है। टीम इंडिया के साथ कोच के रूप में शानदार काम करने वाले कुंबले का इस नए पद का कॉन्ट्रैक्ट 14 अप्रैल से मिल सकता है।
वहीं उनकी जगह कोच पद की भूमिका के लिए कोई नया सदस्य नियुक्त कर सकती हैं, जिसके लिए अंडर 19 और भारत ए टीम के कोच राहुल द्रविड़ पहली पसंद हैं। बता दें कि बीसीसीआई में पिछले साल से ही डायरेक्टर का पद खाली है, क्योंकि रवि शास्त्री का डायरेक्टर पद के लिए कॉन्ट्रैक्ट खत्म हो गया था और अब बीसीसीआई उन्हें दोबारा इस पद के लिए चुनने के पक्ष में नहीं है।
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार अनिल कुंबले को प्रशासकों की समिति ने भारतीय क्रिकेट टीम की एक विस्तृत रिपोर्ट देने के लिए कहा है, जिसमें जूनियर टीम और महिला टीम भी शामिल है। समिति ने अनिल कुंबले को भी इस प्रस्ताव के बारे में सोचने के लिए समय दिया है।
समिति इस बात पर विचार करने के लिए क्रिकेट सलाहकार समिति के साथ जल्द ही बैठक करेगी। भारतीय क्रिकेट सलाहकार समिति में सचिन तेंदुलकर, सौरव गांगुली, और वीवीएस लक्ष्मण है।
काग्रेस के वजुद पर भी सवाल BJP के सहयोगी अपना दल से भी कम सिटे पायी
उत्तर प्रदेश के चुनाव परिणाम (up assembly election result) ने कांग्रेस के वजूद पर सवाल खड़ा कर दिया है. कांग्रेस ने बेहतर प्रदर्शन के लिए सपा से गठजोड़ किया, इस गठबंधन के पीछे खुद राहुल गांधी की अहम भूमिका थी. उन्होंने खुद इस बार चुनाव प्रचार में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया. लेकिन परिणाम ने यूपी में राहुल की रणनीति और कांग्रेस के वजूद पर सवाल खड़े कर दिया है.
हम वजूद शब्द का इस्तेमाल इसलिए कर रहे हैं क्योंकि कांग्रेस ने कुल 105 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे, अमेठी और रायबरेली सालों से कांग्रेस का गढ़ रहा है. लेकिन इस विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को महज 7 सीटों पर जीत मिलती दिख रही है. जबकि बीजेपी की सहयोगी पार्टी 'अपना दल' (एस), जिसका नेतृत्व अनुप्रिया पटेल कर रही हैं, उसके खाते में 9 सीटें जाती दिख रही हैं. यहां रोचक तथ्य ये है कि यूपी में अपना दल ने केवल 11 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं.
अब तक के रुझानों को परिणाम (up election result) मान लिया जाएगा तो अपना दल 11 में से 9 सीटें जीत रही हैं. जबकि कांग्रेस 105 सीटों पर चुनाव लड़कर 7 सीटों पर जीतती दिखाई दे रही है. यानी ये कहा जा सकता है कि उत्तर प्रदेश में अपना दल (एस) की पकड़ कांग्रेस से कहीं ज्यादा है.
अनुप्रिया पटेल ने कहा कि गठबंधन पर यूपी की जनता ने भरोसा किया है. उन्होंने इसका श्रेय पीएम मोदी और यूपी की जनता को दिया है.
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युपी मे रोमियो सावधान बुचडखानो पर भी लगेगी लगाम
यूपी भगवा रंग में रंग गई है. बीजेपी पूर्ण बहुमत से सरकार बना रही है. ऐसे में बीजेपी अब उन बड़े वादों पर काम करेगी, जो उनकी जीत का आधार बने.
बीजेपी ने अपने घोषणा पत्र में एंटी रोमियो स्कवायड का गठन करने का वादा किया. न सिर्फ वादा किया बल्कि चौक-चौराहों पर पोस्टर लगाकर युवतियों तक ये संदेश भी पहुंचाया कि बीजेपी की सरकार आने पर रोमियो ने उन्हें परेशान नहीं करेंगे.
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चुनाव नतीजे आने के बाद बीजेपी के फायरब्रांड नेता योगी आदित्यनाथ ने इस मुद्दे पर बात की. उन्होंने कहा कि वादे के मुताबिक एंडी रोमियो स्कवायड बनाया जाएगा और सभी की सुरक्षा की जाएगी.
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बीजेपी का दूसरा बड़ा मुद्दा अवैध बूचड़खाने बंद करना था. यूपी में चुनाव प्रचार के दौरान बीजेपी के तमाम नेता ये मुद्दा उठाते रहे. खुद पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने मंचों से बूचड़खाने बंद करने का ऐलान किया. अमित शाह ने अपने भाषणों में कहा कि यूपी में खून की नहीं दूध की नदियां बहेंगी. योगी आदित्यनाथ ने इस मुद्दे पर आजतक से कहा कि वह गौ सेवा जारी रखेंगे. साथ ही उन्होंने कहा कि अवैध बूचड़खाने बंद किए जाएंगे. योगी ने कहा कि चुनाव के पहले जो वादे किए गए वो सभी पूरे किए जाएंगे.
युपी मे केसरिया होली ईन 4 कारणों से BJP के हाथ आयीं बाजी
यूपी में मोदी मैजिक के सहारे बीजेपी बंपर जीत की ओर है. सपा-कांग्रेस गठबंधन और बीसएपी पूरी तरह ध्वस्त होते दिख रहे हैं. हम डालते हैं उन नतीजों पर नजर जिन्होंने यूपी में बीजेपी को बाजीगर साबित किया.
1. फिर चला मोदी मैजिक यूपी में बीजेपी की जीत का सबसे बड़ा कारण मोदी मैजिक का फिर से चलना है. केंद्र में भले ही मोदी सरकार तीन साल पूरे करने के करीब हो लेकिन मोदी पर भरोसा कम होते नहीं दिख रहा है. 2014 के लोकसभा चुनाव में यूपी में मोदी मैजिक चला था और यूपी की 80 में 73 सीटों पर बीजेपी और सहयोगिया का कब्जा हो गया था. बीजेपी इसी मैजिक से सहारे यूपी के रण में थी. अब दो तिहाई से ज्यादा सीटें बीजेपी को आती दिख रही हैं. ये सीधे तौर पर मोदी मैजिक है.
2. सपा में विवादों का अखिलेश को नुकसान सपा और कांग्रेस भले ही गठबंधन के सहारे वोटों के गणित का आंकड़ा पेश कर रहे थे लेकिन नतीजे सबके सामने है. सपा-कांग्रेस गठबंधन का हालत एकदम खराब हो गई. सत्ता से अखिलेश के दूर होने का कारण माना जा रहा है मुलायम परिवार में घमासान और फिर सपा सरकार के मंत्रियों के एक के बाद एक विवाद में आते जाना. पारिवारिक घमासान से उबरकर अखिलेश ने खुद की छवि पेश तो की लेकिन एंटी इंकमबेंसी फैक्टर का उन्हें सामना करना पड़ा. चुनाव के दौर में मंत्री गायत्री प्रजापति का रेप केस में नाम आना और फिर फरार रहने को लेकर भी अखिलेश सरकार सवालों के घेरे में आई.
3. कांग्रेस से अभी दूर नहीं हुई है नाराजगी यूपी में बीजेपी ने फिर भारी जीत हासिल की है. जिस कांग्रेस के साथ गठबंधन कर अखिलेश फिर सत्ता में वापसी की आस लगाए बैठे थे उससे कोई लाभ नहीं मिला. 2014 के आम चुनावों में कांग्रेस के खिलाफ जनता में गुस्से का फायदा मोदी टीम को मिला. यूपी में सोनिया और राहुल गांधी को छोड़कर कोई भी कांग्रेस उम्मीदवार नहीं जीत पाया. 2012 के विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस 20-22 सीटों से आगे नहीं बढ़ पाई थी. इस चुनाव में भी बीजेपी अव्वल रही. सोनिया गांधी प्रचार में नहीं उतरीं और प्रियंका गांधी ने भी बस एक सभा की. हालांकि, अखिलेश के साथ साझे रोड शो और रैलियां कर राहुल गांधी ने प्रचार को धार दी लेकिन उससे कोई फायदा नहीं मिला.
4. मायावती खेमे में 2007 जैसे सोशल इंजीनियरिंग की कमी बीजेपी अगर यूपी में सबसे आगे दिख रही है तो मायावती फैक्टर भी इसमें बड़ा कारण है. जिस दलित वोट को लेकर मायावती की पूरी राजनीति टिकी है क्या बीजेपी उसमें सेंध लगाने में सफल रही है. इस चुनाव में मायावती बिना किसी सोशल इजीनियरिंग के उतरीं थी. 2007 के चुनाव में मायावती ने ब्राह्मण और दलित जातियों के गठजोड़ को साधा था और इस समीकरण को लेकर अपने बूते बहुमत हासिल किया था लेकिन इस बात कहानी दोहराई जाए ये मुश्किल दिखता है. कम से कम एग्जिट पोल के नतीजे ते यही कहते हैं. इस बार ब्राह्मण समुदाय मायावती के साथ नहीं था. 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी मैजिक ने बसपा का सबसे अधिक नुकसान किया था. सपा तो 5 और कांग्रेस 2 सीटें जीतने में कामयाब रही थी लेकिन बसपा का तो खाता तक नहीं खुला था. अब विधानसभा चुनाव में भी यही हाल है.
जनता क्यों पसंद नही आयी सपा काग्रेंस की गठबंधन टब कर पढें
नतीजे बता रहे हैं कि यूपी की जनता ने 'अपने लड़कों' पर 'गोद लिए बेटे' को चुना. लेकिन आखिर वो क्या वजहें थीं जिनके चलते लोगों को राहुल और अखिलेश का साथ पसंद नहीं आया?
कुनबे की कलह चुनावों से ऐन पहले मुलायम के कुनबे में जो फैमिली ड्रामा देखने को मिला, उसे जनता के जेहन से कोई चमत्कार ही मिटा सकता था. इस पारिवारिक फूट ने ना सिर्फ समाजवादी पार्टी में कलह को जगजाहिर किया बल्कि यूपी की फर्स्ट फैमिली की इमेज को भी ऐसा नुकसान पहुंचाया जिसकी भरपाई मुमकिन नहीं थी. इसके चलते पार्टी के उम्मीदवारों को लेकर मतभेद रहे और मुलायम के अलावा शिवपाल यादव ने भी प्रचार से दूरी बनाए रखी. जाहिर है जनता ने ऐसे परिवार को सत्ता सौंपने से गुरेज किया जिसके सदस्य एक दूसरे की आंख में आंख मिलाकर देखने को ही राजी ना हों.
कानून-व्यवस्था अखिलेश यादव की सरकार को खराब कानून व्यवस्था का आरोप चुनावों से बहुत पहले से झेलना पड़ रहा था. पिछले 5 सालों के दौरान मुजफ्फरनगर जैसे अनेकों दंगों ने मुस्लिमों के बीच समाजवादी पार्टी की विश्वसनीयता को कम किया. प्रचार के दौरान अमित शाह और नरेंद्र मोदी के अलावा मायावती ने भी इस मुद्दे को जमकर उछाला. राज्य में महिलाओं की असुरक्षा के मुद्दे पर भी अखिलेश सरकार माकूल जवाब देने में नाकाम रही.
यादवपरस्त नीतियां जब मोदी ने प्रचार के दौरान ये आरोप लगाया कि यूपी के थानों से समाजवादी पार्टी का दफ्तर चलता है तो वो दरअसल अखिलेश राज में नौकरियों की भर्तियों में यादवों को मिली तरजीह की ओर इशारा कर रहे थे. पांच साल की भर्तियों के आंकड़े भी इस बात की तस्दीक करते हैं. बीजेपी ने समाजवादी पार्टी पर सरकारी योजनाओं में भी कुछ जातियों को फायदा देने का आरोप लगाया. इससे ना सिर्फ अगड़ी जातियों बल्कि गैर-यादव पिछड़ी जातियों में भी समाजवादी पार्टी के खिलाफ हवा बनी.
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गठबंधन की रणनीति में खामियां अव्वल तो समजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन तब जाकर शक्ल में आया जब चुनावी प्रचार पहले ही उफान पर था. उसपर दोनों पार्टियों के बीच सीटों पर मतभेद सुलझने में भी लंबा वक्त लगा. इतना ही नहीं, मुलायम सिंह यादव और उनके समर्थकों ने गठबंधन को समर्थन देने से इनकार किया. कुछ जानकारों की राय में अखिलेश यादव ने कांग्रेस को सीटें देने में जरुरत से ज्यादा दरियादिली दिखाई और नतीजों में इसका खामियाजा भुगता.
मोदी मैजिक नतीजों से साफ है कि 2014 में देखी गई मोदी लहर अब भी सूबे की सियासत में कमजोर नहीं पड़ी है. पश्चिम यूपी में सियासी जानकार अंदाजा लगा रहे थे कि जाट वोटर आरएलडी की ओर लौटेंगे. बीजेपी से कई नाराजगियों के बावजूद पार्टी ने यहां शानदार प्रदर्शन किया है. कमोबेश ऐसा ही दूसरे हिस्सों में देखने को मिला है. साफ है कि बीजेपी नोटबंदी के बावजूद सभी पार्टियों और वर्गों के वोट हासिल करने में कामयाब रही है और मोदी की करिश्माई शख्सियत इसकी बड़ी वजह है.
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कांग्रेस की कमजोर हालत यूपी में कट्टर से कट्टर कांग्रेसी को भी किसी चमत्कार की उम्मीद नहीं थी. सब जानते हैं कि राज्य में पार्टी के पास वर्कर कम और नेता ज्यादा हैं. ऐसे में गठबंधन की नैया पार करवाने की जिम्मा सिर्फ और सिर्फ अखिलेश के सिर पर था और इस काम में कांग्रेस मददगार कम और बोझ ही ज्यादा साबित हुई.
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