गुरुवार, 30 मार्च 2017

दुर्गा माँ की कहानी

या देवी सर्वभूतेषु चेतनेत्यभिधीयते। नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।। कैलाश पर्वत के ध्यानी की अर्धांगिनी मां सती ही दूसरे जन्म में पार्वती के रूप में विख्या हुई उन्हें ही ही शैलपुत्री‍, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायिनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री आदि नामों से जोड़कर देखा जाता है। जिन्हें दुर्गा, जगदम्बा, अम्बे, शेरांवाली आदि कहा जाता है वे सदाशिव की अर्धांगिनी है। माता की कथा : आदि सतयुग के राजा दक्ष की पुत्री सती माता को शक्ति कहा जाता है। शिव के कारण उनका नाम शक्ति हो गया। हालांकि उनका असली नाम दाक्षायनी था। यज्ञ कुंड में कुदकर आत्मदाह करने के कारण भी उन्हें सती कहा जाता है। बाद में उन्हें पार्वती के रूप में जन्म लिया। पार्वती नाम इसलिए पड़ा की वह पर्वतराज अर्थात् पर्वतों के राजा की पुत्र थी। राजकुमारी थी। पिता की ‍अनिच्छा से उन्होंने हिमालय के इलाके में ही रहने वाले योगी शिव से विवाह कर लिया। एक यज्ञ में जब दक्ष ने सती और शिव को न्यौता नहीं दिया, फिर भी माता सती शिव के मना करने के बावजूद अपने पिता के यज्ञ में पहुंच गई, लेकिन दक्ष ने शिव के विषय में सती के सामने ही अपमानजनक बातें कही। सती को यह सब बरदाश्त नहीं हुआ और वहीं यज्ञ कुंड में कूद कर अपने प्राण त्याग दिए। FILE यह खबर सुनते ही शिव ने अपने सेनापति वीरभद्र को भेजा, जिसने दक्ष का सिर काट दिया। इसके बाद दुखी होकर सती के शरीर को अपने सिर पर धारण कर शिव ‍क्रोधित हो धरती पर घूमते रहे। इस दौरान जहां-जहां सती के शरीर के अंग या आभूषण गिरे वहां बाद में शक्तिपीठ निर्मित किए गए। जहां पर जो अंग या आभूषण गिरा उस शक्तिपीठ का नाम वह हो गया। इसका यह मतलब नहीं कि अनेक माताएं हो गई। माता पर्वती ने ही ‍शुंभ-निशुंभ, महिषासुर आदि राक्षसों का वध किया था। माता का रूप : मां के एक हाथ में तलवार और दूसरे में कमल का फूल है। पितांबर वस्त्र, सिर पर मुकुट, मस्तक पर श्वेत रंग का अर्थचंद्र तिलक और गले में मणियों-मोतियों का हार हैं। शेर हमेशा माता के साथ रहता है। माता की प्रार्थना : जो दिल से पुकार निकले वही प्रार्थना। न मंत्र, न तंत्र और न ही पूजा-पाठ। प्रार्थना ही सत्य है। मां की प्रार्थना या स्तुति के पुराणों में कई श्लोक दिए गए है। माता का तीर्थ : शिव का धाम कैलाश पर्वत है वहीं मानसरोवर के समीप माता का धाम है। जहां दक्षायनी माता का मंदिर बना है। वहीं पर मां साक्षात विराजमान है। वेबदुनिया हिंदी मोबाइल ऐप अब iOS पर भी, डाउनलोड के लिए क्लिक करें। एंड्रॉयड मोबाइल ऐप डाउनलोड करने के लिए क्लिक करें। ख़बरें पढ़ने और राय देने के लिए हमारे फेसबुक पन्ने और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं।

राम मंदिर पर तमाम पक्ष आज अपना जबाव सौपेंगे

राम मंदिर मामले पर कोर्ट से बाहर सेटलमेंट के लिए सुप्रीम कोर्ट की पहल पर तमाम पक्ष आज अपना जवाब सौंपेंगे. देश की शीर्ष अदालत ने इसे धर्म और आस्था से जुड़ा मामला बताते हुए तमाम पक्षकारों से आपसी बातचीत के जरिए हल खोजने को कहा था. यहां तक कि कोर्ट ने जरूरत पड़ने पर मध्यस्थता की पेशकश भी की थी. कोर्ट ने एक हफ्ते का समय दिया था. अदालत की इस पहल से पूरे देश को दशकों से चले आ रहे इस संवेदनशील मामले के जल्द समाधान की उम्मीद जगी है. लेकिन कितनी गुंजाइश है इस मामले में कोर्ट से बाहर सुलह की: क्या कहते हैं पक्षकार? अयोध्या मामले का एक सबसे बड़ा पहलू है कि इस मामले को लेकर देश में जितना भी विवाद उठा हो लेकिन अयोध्या में कभी दंगे नहीं हुए. इस मामले के तमाम पक्षकार कहते हैं कि इसका शांतिपूर्वक समाधान संभव है बस बाहर के लोग माहौल खराब न करें. हनुमानगढ़ी मंदिर के महंत ज्ञानदास ने कहा कि सुब्रमण्यम स्वामी ने राम मंदिर मामले को उलझा दिया है. सबकी सहमति से और न्यायलय की मध्यस्थता में इस मामले का शांतिपूर्ण समाधान होना चाहिए. दोनों पक्ष इसपर सहमत हो सकते हैं. वहीं दूसरे पक्षकार इकबाल अंसारी का कहना है कि परिसर में ही राम मंदिर और मस्जिद का निर्माण हो सकता है. हाईकोर्ट ने इसी आधार पर फैसला सुनाया था. इस मामले में नए राजनीतिक विवाद पैदा करने की कोशिशें नहीं होनी चाहिए. बातचीत से मामले का हल निकल सकता है. किन 4 शर्तों पर अटक रही बात? अयोध्या में राम मंदिर के मुद्दे पर आउट ऑफ कोर्ट सेटलमेंट को लेकर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद आजतक ने बातचीत की पहल की. आज तक ने दोनों पक्षकारों से इस मामले पर बात की और मुद्दे के समाधान को लेकर उनकी राय को सामने लाने की कोशिश की. हिंदू और मुसलमान दोनों ही पक्षों ने कहा कि इस मामले पर केंद्र सरकार दोनों पक्षों से अलग-अलग बात करे. पक्षकारों ने इस मुद्दे को सुलझाने के लिए कई बाते रखीं जिनमें चार शर्तें सामने आईं- शर्त 1- उसी 2.7 एकड़ जमीन पर बने राम मंदिर-मस्जिद. शर्त 2- शर्त- पहल आगे बढ़ाने के लिए केंद्र नुमाइंदे भेजे. शर्त 3- सुब्रमण्यम स्वामी और हाजी महबूब जैसे विवाद बढ़ाने वाले लोग दूर रहें. शर्त 4- अयोध्या में दोनों पक्षकार एक साथ बैठें. किसे रोड़ा मान रहे हैं पक्षकार सुप्रीम कोर्ट में रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद की अहम सुनवाई से ठीक पहले इस मामले में मुख्य पक्षकार स्वर्गीय हाशिम अंसारी के पुत्र इकबाल अंसारी और उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी की ओर से सुप्रीम कोर्ट में मामला उठाये जाने पर सख्त विरोध किया है. दोनों ने सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को खत लिखकर शिकायत की है. शिकायत में कहा गया है कि सुब्रमण्यम स्वामी इस मामले में पक्षकार नहीं हैं, उनका इस केस से कोई लेना देना नही हैं, उन्होंने इस मसले में पार्टी बनने के लिए अदालत में याचिका दायर की थी, जिस पर कई पक्षकारों ने एतराज जाहिर किया था. इकबाल अंसारी और वक्फ बोर्ड के मुताबिक अदालत ने अभी तक स्वामी को पक्ष बनाने के बारे में कोई फैसला नहीं लिया है. लेकिन इसके बावजूद 21 मार्च को स्वामी ने, मामले के असल पक्षकारों को सूचित किए बिना ही जल्द सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट में ये मामला उठा दिया. सुलह की 9 कोशिशें हो चुकी हैं विफल ऐसा नहीं है कि इस मामले में सुलह की ये पहली कोशिश है. इससे पहले 9 बार सुलह की कोशिश हो चुकी है और प्रधानंमत्री के स्तर से भी कोशिशें हो चुकी हैं. -बाबरी मस्जिद और राम मंदिर को लेकर सुलह की पहली कोशिश 1859 में हुई थी. हिन्दू और मुसलमान के बीच दंगे के बाद अंग्रेज अफसरों ने दोनों पक्षों के जिम्मेदार लोगों को बैठाकर मामले को खत्म कराने की कोशिश की और बाड़ लगाकर विवादित जगह को दो भागों में बांट दिया. लेकिन इससे हल नहीं निकला. -1949 में बाबरी मस्जिद में मूर्तियां रखे जाने के बाद नमाज पढ़ा जाना बंद हो गया. -1992 में बाबरी विध्वंस के बाद देशभर में दंगे हुए. पीवी नरसिम्हा राव के प्रधानमंत्री के काल में एक कमीशन गठित किया गया, दोनों पक्षों से बातचीत की कोशिशें हुईं लेकिन बातचीत नतीजे तक ना पहुंच पाई. -अटल बिहारी वाजपेयी ने भी की सुलह की कोशिश अपने कार्यकाल के दौरान की. वाजपेयी ने इसको लेकर दोनों पक्षों से बात भी की लेकिन वो दोनों पक्षों को समझौतों के लिए एक मंच पर नहीं ला पाए. -31 मई 2016 को भी विवाद को लेकर हाशिम अंसारी और महंत नरेंद्र गिरी के बीच बैठक तय हुई थी लेकिन हाशिम अंसारी का इससे पहले की इंतकाल हो गया और ये बैठक फिर कभी ना हुई. क्या था इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला? इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने 2010 में जन्मभूमि विवाद में फैसला सुनाते हुए जमीन को तीनों पक्षकारों में बांटने का आदेश दिया था. हाईकोर्ट ने जमीन को रामलला विराजमान, निर्मोही अखाड़ा और सुन्नी वक्फ बोर्ड में बराबर बराबर बांटने का आदेश दिया था. हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सभी पक्षकारों ने सुप्रीमकोर्ट में अपीलें दाखिल कर रखी हैं जो कि पिछले छह साल से लंबित हैं. 68 साल का सफरनामा 1528: दावा किया जाता है कि अयोध्या में बाबरी मस्जिद का निर्माण हुआ. 1949: बाबरी मस्जिद में गुप्त रूप से भगवान राम की मूर्ति रख दी गई. दावा किया गया कि भगवान राम का यही जन्म हुआ था. इसके बाद ये दावे सामने आए कि मंदिर हटाकर बाबरी मस्जिद बनवाई गई थी. 1984: मंदिर निर्माण के लिए एक कमेटी का गठन किया गया. 1986: इस विवादित स्थल को श्रद्धालुओं के लिए खोला गया. इसी साल 1986 में ही बाबरी मस्जिद कमेटी का गठन किया गया. 1990: लाल कृष्ण आडवाणी ने देशव्यापी रथयात्रा की शुरुआत की. साल 1991 में रथयात्रा का पायदा बीजेपी को हुआ और वो यूपी की सत्ता में आ गई. मंदिर बनाने के लिए देशभर से ईंटें भेजी गईं. 1992: 6 दिसंबर के दिन हजारों की संख्या में सेवकों ने अयोध्या पहुंचकर बाबरी मस्जिद ढहा दिया, जिसके बाद सांप्रदायिक दंगे हुए. 1992: न्यायूमूर्ति लिब्रहान की अध्यक्षता में एक जांच आयोग का गठन किया गया. 1993: इस आयोग ने जांच शुरू की. 2002: विवादित स्थल पर सैकड़ों श्रद्धालुओं का जमावड़ा शुरू हुआ. हाईकोर्ट के एएसआई को इस बात की जांच करने के लिए कहा गया कि 1528 में पहले वहां मस्जिद थी या नहीं. 2003: एएसआई ने कहा कि मंदिर अवशेष के सबूत हैं. 2009: लिब्रहान आयोग ने अपनी रिपोर्ट सौंपी. 2010: हाईकोर्ट ने इन विवादित स्थल को तीन हिस्सों में बांटने का फैसला सुनाया. 2011: सुप्रीम कोर्ट नें हाईकोर्ट के फैसले पर स्टे लगा दिया. क्या है आगे की राह? सुप्रीम कोर्ट ने दोनो पक्षों को आपसी सुलह से बीच का रास्ता निकालने का मौका दिया और साथ ही कहा है कि अगर बात नहीं बनती तो अदालत अपना फैसला सुनाएगी. अब बातचीत को आगे बढ़ाने का दारोमदार केंद्र की मोदी सरकार और यूपी की योगी सरकार पर है. बीजेपी ने बातचीत से मामले का हल निकलने की उम्मीद जताई है साथ ही कहा है कि गतिरोध को दूर कर राम मंदिर बनेगा. कांग्रेस ने इसे समाधान का बड़ा मौका बताया है. लेकिन बीजेपी नेता सुब्रमण्यम स्वामी के इस बयान पर बवाल मचा कि मस्जिद सरयू पार बनाया जाए. साथ ही कि अगर मंदिर मुद्दे पर सहमति नहीं बनती है तो 2018 में जब राज्यसभा में भी बीजेपी का बहुमत होगा तो कानून बनाया जाएगा. देखना होगा कि सियासत के बीच राम मंदिर का मुद्दा किस ओर बढ़ता है वो भी तब जब देश की शीर्ष अदालत सुलह के पक्ष में है.

योगी के UP मे अब मुस्लिमों ने लगाए राम मंदिर बनवाने के लिए बैनर

उत्तर प्रदेश के अयोध्या में राम मंदिर निर्माण को लेकर तेज होती कवायद के बीच राजधानी लखनऊ में मंदिर निर्माण को लेकर कई जगह-जगह होर्डिंग्स और बैनर लगे हैं. इन बैनरों की खास बात यह है कि इसे कुछ मुस्लिम संगठनों ने लगाया है. इन संगठनों ने होर्डिंग्स-बैनर में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर दोनों पक्षों से मिल-बैठकर मामला सुलझाने की अपील की गई है. ऐसे ही एक संगठन 'श्री राम मंदिर निर्माण मुस्लिम कारसेवक मंच' के अध्यक्ष आजम खान ने लखनऊ में ऐसे करीब 10 होर्डिंग्स लगाए हैं, जिसमें उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों पर आगे बढ़ने का आह्वान किया है. इस बारे में हमने जब आजम खान से संपर्क किया, तो बंदूकधारी गार्ड से घिरे आजम खान कहते हैं, 'राम हिन्दुओं की तरह मुस्लिमों के लिए आदरणीय हैं. मुझे 'जय श्री राम' कहने में कोई हिचक नहीं.' आजम का दावा है कि उनके साथ बड़ी तादाद में युवा जुड़ रहे हैं. ये लोग दोनों समुदायों के बीच सौहार्द्र बढ़ाने की कोशिशों में जुटे हैं. हालांकि इसके साथ ही आजम यह भी कहते हैं कि उन्हें इस कदम से बाद से कई धमकियां मिल रही हैं. इंडिया टुडे से बातचीत में वह कहते हैं, 'मुझे ई-मेल और फोन पर धमकी की जा रही है. वे मुझसे यह मुद्दा छोड़ने या फिर बाबरी मस्जिद दोबारा बनवाने के पक्ष में बोलने को कहने कह रहे हैं.' इसके साथ ही वह कहते हैं कि उन्हें अपने वापस खींचने के लिए पैसों तक के ऑफर मिल रहे हैं. आजम कहते हैं कि उन्होंने इस संबंध में पुलिस में FIR भी दर्ज कराई है, लेकिन उन्होंने पुलिस से अब तक कोई सुरक्षा कवर नहीं मिला है. बता दें कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बीजेपी को प्रचंड बहुमत मिलने के बाद योगी आदित्यनाथ के सीएम बनने और आयोध्या विवाद को लेकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा सभी पक्षों से मिलकर आपस में यह विवाद सुलझाने के निर्देश के बाद से ही राम मंदिर निर्माण की बातें एक बार फिर जोरशोर से उठने लगी हैं. ऐसे में आजम खान की यह कोई कोशिश इसी कड़ी के हिस्से के रूप में देखी जा रही है." - http://tz.ucweb.com/3_2ezyg

कारगिल युद्ध की चौकाने वाली बात

करगिल युद्ध के 10 चौंकाने वाले राज, जानिए कब-कब झूठा साबित हुआ था पाकिस्तान श्रीनगर. कश्मीर हमेशा से एक विवादित क्षेत्र रहा है। पाकिस्तान ने कई बार इसे भारत से छीनने का प्रयास किया है। पाकिस्तान की कोशिशों को भारत के सिपाहियों ने हर बार नाकाम कर दिया। करगिल की लड़ाई भी ऐसी ही एक जाबाज जंग की कहानी है। इस लड़ाई में हमारे सैनिकों ने पाकिस्तानी फौज का जमकर मुकाबला किया था। पाकिस्तानी घुसपैठियों ने लगातार गोलियां चलाई और हमारे सैनिकों ने उन्हें सामने से जवाब दिया। इस साल कारगिल का 17वां विजय दिवस मानाया जाएगा इस मौके पर आपको बता रहा है कारगिल युद्ध से जुड़े चौंकाने वाले राज.... और पढ़ें 2 of 13 करगिल सेक्टर में लड़ाई शुरू होने से पहले जनरल परवेज मुशर्रफ ने एक हेलिकॉप्टर से नियंत्रण रेखा पार की थी और भारतीय भूभाग में करीब 11 किमी अंदर एक स्थान पर रात भी बिताई थी। 3 of 13 पाकिस्तान के लगभग 2700 सैनिकों ने इस युद्ध में जान गंवाई थी। #2. जब पकड़ाया पाकिस्तान का झूठ... एक बड़े खुलासे के तहत पाकिस्तान का दावा झूठा साबित हुआ कि करगिल लड़ाई में मुजाहिदीन शामिल थे। यह लड़ाई पाकिस्तान के नियमित सैनिकों ने लड़ी। पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के पूर्व अधिकारी शाहिद अजीज ने यह राज उजागर किया था। 4 of 13 बेनेजीर भुट्टो #3. बेनेजीर भुट्टो के आगे रखा था युद्ध का प्रस्ताव - पत्रकार वीर सांघवी को दिए एक इंटरव्यू में पूर्व पाकिस्तान पीएम बेनजीर भुट्टो ने बताया था कि मुशर्रफ ने मेरे सामने युद्ध में जीतने और श्रीनगर पर कब्जे की बात कही थी। - बेनजीर ने इसे खारिज कर दिया था। क्योंकि उन्हें डर था कि पाकिस्तान को श्रीनगर से ही नहीं, बल्कि आजाद कश्मीर से भी हाथ धोना पड़ सकता है। - बता दें कि उस वक्त मुशर्रफ उस दौरान डायरेक्टर जनरल ऑफ मिलिट्री ऑपरेशन्स थे। - बेनजीर के मुताबिक जब हमने जनरल जिया के नेतृत्व में सियाचिन को गवायां था तभी से ऐसे कोई कदम उठाने की तैयारी हो रही थी। 5 of 13 पाकिस्तानी सेना करगिल युद्ध को 1998 से अंजाम देने की फिराक में थी। #4. 1998 से युद्ध को अंजाम देने की फिराक में थी पाकिस्तान पाकिस्तानी सेना करगिल युद्ध को 1998 से अंजाम देने की फिराक में थी। इस काम के लिए पाक सेना ने अपने 5000 जवानों को कारगिल पर चढ़ाई करने के लिए भेजा था। 6 of 13 करगिल की लड़ाई के दौरान पाकिस्तानी एयर फोर्स के चीफ को पहले इस ऑपरेशन की खबर नहीं दी गई थी। #5. मना कर दिया था एयर फोर्स चीफ ने साथ देने से करगिल की लड़ाई के दौरान पाकिस्तानी एयर फोर्स के चीफ को पहले इस ऑपरेशन की खबर नहीं दी गई थी। जब इस बारे में पाकिस्तानी एयर फोर्स के चीफ को बताया गया तो उन्होंने इस मिशन में आर्मी का साथ देने से मना कर दिया था। 7 of 13 करगिल का युद्ध पाकिस्तानी सेना के लिए एक आपदा साबित हुआ था। #6. पाकिस्तान के लिए आपदा साबित हुआ पाकिस्तान के उर्दू डेली में छपे एक बयान में नवाज शरीफ ने इस बात को स्वीकारा था कि करगिल का युद्ध पाकिस्तानी सेना के लिए एक आपदा साबित हुआ था। पाकिस्तान ने इस युद्ध में 2700 से ज्यादा सैनिक खो दिए थे। पाकिस्तान को 1965 और 1971 की लड़ाई से भी ज्यादा नुकसान हुआ था। 8 of 13 भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तानी सैनिकों के खिलाफ कारगिल युद्ध में मिग-27 और मिग-29 का प्रयोग किया था। #7. कारगिल युद्ध में मिग-27 और मिग-29 का प्रयोग भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तानी सैनिकों के खिलाफ कारगिल युद्ध में मिग-27 और मिग-29 का प्रयोग किया था। मिग-27 की मदद से इस युद्ध में उन स्थानों पर बम गिराए जहां पाक सैनिकों ने कब्जा जमा लिया था। इसके अलावा मिग-29 करगिल में बेहद महत्वपूर्ण साबित हुआ इस विमान से पाक के कई ठिकानों पर आर-77 मिसाइलें दागी गईं थीं। 9 of 13 करगिल की लड़ाई का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस युद्ध में वायुसेना के करीब 300 विमान उड़ान भरते थे। #8. वायुसेना के करीब 300 विमान उड़ान भरते थे 8 मई को कारगिल युद्ध शुरू होने के बाद 11 मई से भारतीय वायुसेना की टुकड़ी ने इंडियन आर्मी की मदद करना शुरू कर दिया था। करगिल की लड़ाई का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इस युद्ध में वायुसेना के करीब 300 विमान उड़ान भरते थे। 10 of 13 कारगिल की ऊंचाई समुद्र तल से 16000 से 18000 फीट ऊपर है। #9. ऊंचाई की थी दिक्कत करगिल की ऊंचाई समुद्र तल से 16000 से 18000 फीट ऊपर है। ऐसे में उड़ान भरने के लिए विमानों को करीब 20,000 फीट की ऊंचाई पर उड़ना पड़ता है। ऐसी ऊंचाई पर हवा का घनत्व 30% से कम होता है। इन हालात में पायलट का दम विमान के अंदर ही घुट सकता है और विमान दुर्घटनाग्रस्त हो सकता है। 11 of 13 300 से अधिक तोपों, मोर्टार और रॉकेट लॉन्चरों ने रोज करीब 5,000 बम फायर किए थे भारत ने । #10. कारगिल युद्ध में तोपखाने (आर्टिलरी) से 2,50,000 गोले और रॉकेट दागे गए भारत और पाकिस्तान के बीच 1999 में लड़े गए कारगिल युद्ध में तोपखाने (आर्टिलरी) से 2,50,000 गोले और रॉकेट दागे गए थे। 300 से अधिक तोपों, मोर्टार और रॉकेट लॉन्चरों ने रोज करीब 5,000 बम फायर किए थे। लड़ाई के महत्वपूर्ण 17 दिनों में प्रतिदिन हर आर्टिलरी बैटरी से औसतन एक मिनट में एक राउंड फायर किया गया था। दूसरे विश्व युद्ध के बाद यह पहली ऐसी लड़ाई थी, जिसमें किसी एक देश ने दुश्मन देश की सेना पर इतनी अधिक बमबारी की थी। 12 of 13 मुशर्रफ ने परमाणु हथियार तक इस्तेमाल करने की तैयारी कर ली थी। #11. परमाणु हथियार का होने वाला था इस्तेमाल... जानकारी के मुताबिक, पाकिस्तान ने 1998 में परमाणु हथियारों का परीक्षण किया था। कई लोगों का कहना है कि करगिल की लड़ाई उम्मीद से ज्यादा खतरनाक थी। हालात को देखते हुए मुशर्रफ ने परमाणु हथियार तक इस्तेमाल करने की तैयारी भी कर ली थी। 13 of 13 करगिल युद्ध के दौरान पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने अमेरिका के तत्कालीन प्रेसिडेंट बिल क्लिंटन को फोन कर व्हाइट हाउस में अकेले में मिलने का समय मांगा। #12. बिल क्लिंटन को नहीं था पाकिस्तान पर भरोसा - करगिल युद्ध में पूरी दुनिया में शर्मिंदगी उठा रहे पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने अमेरिका के तत्कालीन प्रेसिडेंट बिल क्लिंटन को फोन कर व्हाइट हाउस में अकेले में मिलने का समय मांगा। - जवाब में क्लिंटन ने साफ कह दिया कि वह अमेरिका तभी आए जब आप भारतीय क्षेत्र से बाहर निकलेंगे। - हालांकि 4 जून 1999 को शरीफ एक प्राइवेट प्लेन में वॉशिंगटन चुपके से गए थे। उस वक्त उन्होंने करगिल विवाद को खत्म करने के समझौते पर क्लिंटन से चर्चा की थी। - इस दौरान बिल क्लिंटन ने अपने डिफेंस सेक्रेटरी ब्रूस रिडेल को कमरे में बिठाए रखा। उन्हें डर था कि कही शरीफ इस चर्चा में अपने मन से कुछ जोड़ न दे।

केवट और प्रभु श्री राम का प्रसंग

केवट और प्रभु श्रीराम का प्रसंग निषादराज केवट, रामायण का एक पात्र है। जिसने प्रभु श्रीराम को वनवास के दौरान माता सीता और लक्ष्मण के साथ अपने नाव में बिठा कर गंगा पार करवाया था। इसका वर्णन रामायण के अयोध्याकाण्ड में किया गया है। राम केवट को आवाज देते हैं - नाव किनारे ले आओ, पार जाना है। मागी नाव न केवटु आना। कहइ तुम्हार मरमु मैं जाना॥ चरन कमल रज कहुं सबु कहई। मानुष करनि मूरि कछु अहई॥ - श्रीराम ने केवट से नाव मांगी, पर वह लाता नहीं है। वह कहने लगा- मैंने तुम्हारा मर्म जान लिया। तुम्हारे चरण कमलों की धूल के लिए सब लोग कहते हैं कि वह मनुष्य बना देने वाली कोई जड़ी है। वह कहता है कि पहले पांव धुलवाओ, फिर नाव पर चढ़ाऊंगा। अयोध्या के राजकुमार केवट जैसे सामान्यजन का निहोरा कर रहे हैं। यह समाज की व्यवस्था की अद्भुत घटना है। केवट चाहता है कि वह अयोध्या के राजकुमार को छुए। उनका सान्निध्य प्राप्त करें। उनके साथ नाव में बैठकर अपना खोया हुआ सामाजिक अधिकार प्राप्त करें। अपने संपूर्ण जीवन की मजूरी का फल पा जाए। राम वह सब करते हैं, जैसा केवट चाहता है। उसके श्रम को पूरा मान-सम्मान देते हैं। उसके स्थान को समाज में ऊंचा करते हैं। राम की संघर्ष और विजय यात्रा में उसके दाय को बड़प्पन देते हैं। त्रेता के संपूर्ण समाज में केवट की प्रतिष्ठा करते हैं। केवट भोईवंश का था तथा मल्लाह का काम करता था। केवट प्रभु श्रीराम का अनन्य भक्त था। केवट राम राज्य का प्रथम नागरिक बन जाता है। राम त्रेता युग की संपूर्ण समाज व्यवस्था के केंद्र में हैं, इसे सिद्ध करने की जरूरत नहीं है।

मोहन भागवत संघ सचांलक जीवनी

मोहन भागवत मोहनराव मधुकरराव भागवत जन्म 11 सितम्बर 1950 चन्द्रपुर, भारत धर्म हिन्दुत्व मोहन मधुकर भागवत (जन्म: 11 सितम्बर 1950, चन्द्रपुर महाराष्ट्र) एक पशु चिकित्सक और 2009 से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक हैं। उन्हें एक व्यावहारिक नेता के रूप में देखा जाता है। के एस सुदर्शन ने अपनी सेवानिवृत्ति पर उन्हें अपने उत्तराधिकारी के रूप में चुना था।[1] प्रारम्भिक जीवन संपादित करें मोहनराव मधुकरराव भागवत का जन्म महाराष्ट्र के चन्द्रपुर नामक एक छोटे से नगर में 11 सितम्बर 1950 को हुआ था। वे संघ कार्यकर्ताओं के परिवार से हैं।[1] उनके पिता मधुकरराव भागवत चन्द्रपुर क्षेत्र के प्रमुख थे जिन्होंने गुजरात के प्रान्त प्रचारक के रूप में कार्य किया था।[1] मधुकरराव ने ही लाल कृष्ण आडवाणी का संघ से परिचय कराया था। उनके एक भाई संघ की चन्द्रपुर नगर इकाई के प्रमुख हैं। मोहन भागवत कुल तीन भाई और एक बहन चारो में सबसे बड़े हैं। मोहन भागवत ने चन्द्रपुर के लोकमान्य तिलक विद्यालय से अपनी स्कूली शिक्षा और जनता कॉलेज चन्द्रपुर से बीएससी प्रथम वर्ष की शिक्षा पूर्ण की। उन्होंने पंजाबराव कृषि विद्यापीठ, अकोला से पशु चिकित्सा और पशुपालन में स्नातक की उपाधि प्राप्त की। 1975 के अन्त में, जब देश तत्कालीन प्रधानमन्त्री इंदिरा गान्धी द्वारा लगाए गए आपातकाल से जूझ रहा था, उसी समय वे पशु चिकित्सा में अपना स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम अधूरा छोड़कर संघ के पूर्णकालिक स्वयंसेवक बन गये।[1] संघ से सम्बन्ध संपादित करें आपातकाल के दौरान भूमिगत रूप से कार्य करने के बाद 1977 में भागवत महाराष्ट्र में अकोला के प्रचारक बने और संगठन में आगे बढ़ते हुए नागपुर और विदर्भ क्षेत्र के प्रचारक भी रहे।[1] 1991 में वे संघ के स्वयंसेवकों के शारीरिक प्रशिक्षण कार्यक्रम के अखिल भारतीय प्रमुख बने और उन्होंने 1999 तक इस दायित्व का निर्वहन किया। उसी वर्ष उन्हें, एक वर्ष के लिये, पूरे देश में पूर्णकालिक रूप से कार्य कर रहे संघ के सभी प्रचारकों का प्रमुख बनाया गया। वर्ष 2000 में, जब राजेन्द्र सिंह (रज्जू भैया) और हो०वे० शेषाद्री ने स्वास्थ्य सम्बन्धी कारणों से क्रमशः संघ प्रमुख और सरकार्यवाह का दायित्व छोडने का निश्चय किया, तब के एस सुदर्शन को संघ का नया प्रमुख चुना गया और मोहन भागवत तीन वर्षों के लिये संघ के सरकार्यवाह चुने गये। 21 मार्च 2009 को मोहन भागवत संघ के सरसंघचालक मनोनीत हुए। वे अविवाहित हैं तथा उन्होंने भारत और विदेशों में व्यापक भ्रमण किया है। वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख चुने जाने वाले सबसे कम आयु के व्यक्तियों में से एक हैं। उन्हें एक स्पष्टवादी, व्यावहारिक और दलगत राजनीति से संघ को दूर रखने के एक स्पष्ट दृष्टिकोण के लिये जाना जाता है। विचार संपादित करें मोहन भागवत को एक व्यावहारिक नेता के रूप में देखा जाता है। उन्होंने हिन्दुत्व के विचार को आधुनिकता के साथ आगे ले जाने की बात कही है।[2] उन्होंने बदलते समय के साथ चलने पर बल दिया है। लेकिन इसके साथ ही संगठन का आधार समृद्ध और प्राचीन भारतीय मूल्यों में दृढ़ बनाए रखा है।[3] वे कहते हैं कि इस प्रचलित धारणा के विपरीत कि संघ पुराने विचारों और मान्यताओं से चिपका रहता है, इसने आधुनिकीकरण को स्वीकार किया है और इसके साथ ही यह देश के लोगों को सही दिशा भी दे रहा है।[3] हिन्दू समाज में जातीय असमानताओं के सवाल पर, भागवत ने कहा है कि अस्पृश्यता के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए। इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि अनेकता में एकता के सिद्धान्त के आधार पर स्थापित हिन्दू समाज को अपने ही समुदाय के लोगों के विरुद्ध होने वाले भेदभाव के स्वाभाविक दोषों पर विशेष ध्यान देना चाहिए। केवल यही नहीं अपितु इस समुदाय के लोगों को समाज में प्रचलित इस तरह के भेदभावपूर्ण रवैये को दूर करने का प्रयास भी करना चाहिए तथा इसकी शुरुआत प्रत्येक हिन्दू के घर से होनी चाहिए।[4] सन्दर्भ संपादित करें ↑ अ आ इ ई उ मोहन भागवत: 30 से अधिक वर्षों से एक पशु चिकित्सक और संघ के प्रचारक, 21 मार्च 2009, टाइम्स ऑफ इंडिया, [1] ↑ संघ ने मोहन भागवत को अपना नया प्रमुख घोषित किया: 'व्यावहारिक' और आडवाणी के दोस्त, रविवार, 22 मार्च 2009, इंडियन एक्सप्रेस ↑ अ आ संघ बदलते समय के साथ आगे बढ़ता है: भागवत, रविवार, 20 नवम्बर 2005, प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया, इंडियन एक्सप्रेस ↑ समाज से भेदभाव मिटाएं, सोमवार, 29 जनवरी 2007, हिन्दू [2]

दुर्गा माॅ की वर्णन

श्री दुर्गा माता की आरती में जानें आरती हिन्दू धर्म में आदि शक्ति दुर्गा का स्थान सर्वोपरि माना गया है। मान्यता है कि दुर्गा जी इस भौतिक संसार में सभी सुखों की दात्री हैं। उनकी भक्ति कर भक्त अपनी सभी मनोकामनाएं पूर्ण कर सकते हैं। साथ ही साधकों को देवी दुर्गा ही साधनाएं प्रदान करती हैं। मां दुर्गा की साधना में लोग मां की आरती का भी पाठ करते हैं। दुर्गा जी की आरती (Durga Aarti in Hindi) जय अम्बे गौरी, मैया जय श्यामा गौरी तुम को निस दिन ध्यावत मैयाजी को निस दिन ध्यावत हरि ब्रह्मा शिवजी ।| जय अम्बे गौरी ॥ माँग सिन्दूर विराजत टीको मृग मद को |मैया टीको मृगमद को उज्ज्वल से दो नैना चन्द्रवदन नीको|| जय अम्बे गौरी ॥ कनक समान कलेवर रक्ताम्बर साजे| मैया रक्ताम्बर साजे रक्त पुष्प गले माला कण्ठ हार साजे|| जय अम्बे गौरी ॥ केहरि वाहन राजत खड्ग कृपाण धारी| मैया खड्ग कृपाण धारी सुर नर मुनि जन सेवत तिनके दुख हारी|| जय अम्बे गौरी ॥ कानन कुण्डल शोभित नासाग्रे मोती| मैया नासाग्रे मोती कोटिक चन्द्र दिवाकर सम राजत ज्योति|| जय अम्बे गौरी ॥ शम्भु निशम्भु बिडारे महिषासुर घाती| मैया महिषासुर घाती धूम्र विलोचन नैना निशदिन मदमाती|| जय अम्बे गौरी ॥ चण्ड मुण्ड शोणित बीज हरे| मैया शोणित बीज हरे मधु कैटभ दोउ मारे सुर भयहीन करे|| जय अम्बे गौरी ॥ ब्रह्माणी रुद्राणी तुम कमला रानी| मैया तुम कमला रानी आगम निगम बखानी तुम शिव पटरानी|| जय अम्बे गौरी ॥ चौंसठ योगिन गावत नृत्य करत भैरों| मैया नृत्य करत भैरों बाजत ताल मृदंग और बाजत डमरू|| जय अम्बे गौरी ॥ तुम हो जग की माता तुम ही हो भर्ता| मैया तुम ही हो भर्ता भक्तन की दुख हर्ता सुख सम्पति कर्ता|| जय अम्बे गौरी ॥ भुजा चार अति शोभित वर मुद्रा धारी| मैया वर मुद्रा धारी मन वाँछित फल पावत देवता नर नारी|| जय अम्बे गौरी ॥ कंचन थाल विराजत अगर कपूर बाती| मैया अगर कपूर बाती माल केतु में राजत कोटि रतन ज्योती|| बोलो जय अम्बे गौरी ॥ माँ अम्बे की आरती जो कोई नर गावे| मैया जो कोई नर गावे कहत शिवानन्द स्वामी सुख सम्पति पावे|| जय अम्बे गौरी ॥ देवी वन्दना या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता| नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम: ||